Seabed mining

आखिर क्या है सीबेड माइनिंग?

गैजेट-टेक्नोलॉजी देश

कुछ समय पूर्व विज्ञान मंत्रालय ने “डीप ओशन मिशन “को तैयार किया. भारत को गहरे समुद्र में खनन अन्वेषण के लिए यू एन इंटरनेशनल सी बेड अथोरिटी द्वारा वर्ष 1987 में हिंदमहासागर बेसिन में पालिमेआलिक नोड्यूल्स में प्रयोग किया. अंतराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण ने हिंद महासागर में गहरे समुद्र में खनिज संसाधन के अन्वेषण के लिए 15 साल का समझौता किया. पिछले कुछ वर्षों से विश्व में समुद्र में खनन की गतिविधिया तेज हुई है,इसके दो कारण हैं, भोजन और धातुओं की बढ़ती मांग.

दुनिया की बढ़ती जनसंख्या को ज्यादा भोजन की आवश्यकता है. फास्फोरस ग्रथिकाओं का खनन उर्वरक का स्रोत है. समुद्र तल में जमा धातुओं को बाल्टी प्रणाली या हाइड्रालिक पम्प के प्रयोग से निकाला जाता है. पालीमेटालिक ग्रंथियों में तांबा,निकेल, मैगजीन, कोबाल्ट मिलते हैं जो 4000-6000 मीटर की गहराई पर मिलते हैं.

भारत को लाभ

पालिमेटलिक नोड्यूल (पीएमएन) के दोहन के लिये भारत को हिन्द महासागर बेसिन (सीआईओबी) में 1,50,000 किलोमिटर का क्षेत्र मिला.इनमे मैगजीन, कोबाल्ट,लोहे और निकल से बनी हुई चट्टाने है. हिंद महासागर में समुद्र के तल पर 380 मिलियन मीट्रिक टन पालिमेटेलिक नोड्यूल प्राप्त है यदि इसका 10% भी मिले तो आने वाले 100वषो तक भारत की ऊर्जा की पूर्ती कर सकता है. समुद्र की बहुत सारी चीजों में शोध हो रही है, पानी की अधिकता से रोजगार की भी संभावनाएं हैं. विश्व की 9-10% लोगों को समुद्र रोजगार दिला सकता है,88%रोजगार छोटे मछुवारों मिल सकता हैं.

भविष्य में क्या?

देश की अधिक जनसंख्या और धरती में कम होती संभावनाओं के बीच विश्व के देशों की तरह भारत ने भी समुद्री शोध से ज्यादा कर लेने के बारे में सोचना.समुद्री अथृव्यवस्था का अर्थ है समुद्र में खनिज पदार्थों, गैस,तेल और जरूरी चीजों का प्रयोग अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए है.विश्व के किसी देश ने गहरे पानी में खनन की प्रक्रिया प्रारंभ नहीं की है.समुद्र पदार्थों और पत्थरों की खोज इतनी तेज हुयी है कि इसके उपयोग से कैंसर,अस्थमा जैसी बहुत बीमारियो को दूर करने के लिए दवा बनायी था सकती है.

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