pakistani movie 'bol' poster

बोल : विरोध ज़रूरी है…!!

मनोरंजन

नसीहतों और भाषणों की भीड़ से बिल्कुल परे फिल्म आर्ट का एक अपना मकाम है. बोल नाम की इस पाकिस्तानी फिल्म को खुली नज़र से देखने वाला एक होशमंद दर्शक फिल्म आर्ट के इस मक़ाम को साफ महसूस कर सकता है.

ये फिल्म पाकिस्तान में 2011 में रिलीज़ हुई और उसके कुछ महीनों  बाद भारत में.शौएब मँसूर द्वारा निर्देशित इस फिल्म में पात्रों के संवाद महज़ भाषणबाजी नहीँ लगते। फिल्म फ्लेशबेक मोड में चलती है.

फिल्म द्वारा उठाये गये मुद्दों को समझने के लिये फिल्म की कहानी संक्षेप में इस प्रकार है –

a shot from pakistani movie 'Bol'
फिल्म ‘बोल’ का एक दृश्य

फिल्म के केंद्र में एक रुढ़िवादी मुस्लिम परिवार है ;जिसमें सात बेटियाँ, एक बेटा ,एक मजबूर माँ और बाप की शक्ल में एक कट्टरपंथी मुल्ला “हकीम साहब” है। बेटे की चाहत में हकीम साहब के घर में बेटियों का मेला लग जाता है. उसकी चौहद्वीं संतान सैफुल्ला “सैफ़ी” एक किन्नर के रूप में जन्म लेती है. उधर डॉक्टरों के बढ़ते बाज़ार के फलस्वरूप हकीमी का धँधा चौपट हो चुका होता है. हकीम साहब की इस गरीबी और गुस्से की मार सैफ़ी और पूरा परिवार झेलता है. लड़कियाँ पाँचवी के बाद ‘घर में बंद कर दी’ जाती हैं, और अपनी ज़ायज़ खुशियों से भी वंचित कर दी  जाती है. फ़िर सबसे बड़ी बेटी जैनब (जो हकीम साहब की हत्या के जुर्म में अपनी फांसी से पहले मीडिया को पूरी कहानी सूना रही है ) अपनी माँ को हकीम साहब के शोषण से बचाने के लिये उसका ऑपरेशन करवा देती है. इसके बाद हकीम से उसका सन्तान उत्पति पर संवाद बेहद अर्थपूर्ण है. इस संवाद में जैनब इस्लामी की शिक्षाओं का हवाला देकर हकीम साहब का मुँह सिल देती है. फ़िर एक हादसा परिवार को बुरे दिनों में ला खड़ा करता है. सामाजिक बँदिशो को तोड़ते हुए ये परिवार उस स्थिती से उबरने में भी सफल हो ही जाता है.

ये डायरेक्टर का कमाल है कि फिल्म में हर दृश्य का अपना अंदाज़ और महत्व है. कहीँ कोई बोझिलता या ऊबाऊपन नहीं है. हर संवाद कलेजे को चीरता और झकझोरता है. तकनीकी पहलू की अगर बात की जाये तो फिल्म की पटकथा, संवाद, और निर्देशन वाकई बहुत खूब है. जैनब के रूप में हुमैमा मलिक और हकीम साहब की भूमिका में मंजर शहबद का अभिनय जीवंत और अविस्मरणीय है. पड़ोसी के जवान बेटे के किरदार में आतिफ असलम का अभिनय भी काबिले तारीफ़ है. अलबत्ता जैनब की छोटी बहन के रूप में माहिरा खान बहुत प्रभा18वी नहीँ लगती. फिल्म का एक गाना “दिल परेशां है……..रात भारी है “बहुत पसंद आया.

“बोल” फिलम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसमें उठाये गये मुद्दे हैं। मर्दवाद का विरोध, परिवार नियोजन, किन्नरों से किया जाने वाला बुरा व्यवहार, जेंडर जस्टिस, स्त्री शिक्षा आदि मुद्दों के लिये फिल्म आवाज़ उठाती है. फिल्म में धर्म के स्वघोषित ठेकेदारों के साथ साथ धर्म को भी निशाना बनाया गया है. जो फिल्मकार और लेखक के धर्म के अंध-विरोध को दर्शाता है. जिस प्रकार अंध-भक्ति गलत है उसी प्रकार बिना स्वस्थ विमर्श के किया गया विरोध पूर्वाग्रहों को दर्शाता है. फिल्म की नारीवादी अप्रोच मर्दवादी पितृसत्तात्मक  समाज को हिलाकर रख देती है. फिल्म का मुस्लिम समाज के साथ साथ सभी समाजों को यह संदेश है कि “अगर सन्तान की सही परवरिश नहीं कर सकते तो उसे जन्म भी मत दो.” फिल्म का केंद्रीय किरदार जैनब फाँसी से पहले ये सवाल छोड़कर भी जाती है कि “क्यों किसी की जान लेना ही अपराध है जन्म देना क्यों नहीं?”  जो घनघोर विमर्श का विषय है.

अंत में प्रोड्यूसर,  डायरेक्टर शौएब मँसूर और उनकी पूरी टीम को “बोल” नामक इस दमदार कृति के लिए बधाई.

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